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जगन्नाथ रथयात्रा : जानिए क्या है परंपरा इस रथयात्रा की !

जगन्नाथ रथ यात्रा:-

जगन्नाथपुरी की रथ यात्रा हिन्दू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया में प्रारम्भ होती है। हिन्दू धर्म में यह यात्रा एक उत्सव की तरह मनाई जाती है, क्योकि अपने समस्त भक्तों को भगवान जगन्नाथ गर्भगृह से निकल कर साक्षात दर्शन देते हैं। या कहें, भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के बहाने अपनी प्रजा से मिलते हैं और उनके साथ साथ यात्रा करते हैं।

जगन्नाथ भारतवर्ष के उड़ीसा राज्य में स्थित है। खूबसूरत समुद्र के किनारे और नारियल के पेड़ों के बीच बसा यह जगन्नाथ का भव्य मंदिर पर्यटकों के बीच भी काफी प्रसिद्द है। इस मंदिर में जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बळिभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की मूर्तियां हैं। देवी सुभद्रा अपने दोनों भाइयों के मध्य में विराजमान हैं।

मंदिर की विशेषता :-

यह मंदिर कई मायनों में अन्य मंदिरों से अलग है, यहां भगवान की मूर्तियां पूर्ण न होकर अधूरी ही हैं। देवी सुभद्रा पीत वर्ण, बळिभद्र श्वेत वर्ण तथा भगवान जगन्नाथ श्याम वर्ण के हैं।

इन मूर्तियों का निर्माण नीम की लकड़ी से किया जाता है। विश्व में केवल यही एक मंदिर है जहाँ भगवान शरीर बदलते हैं अर्थात वे अपना पुरातन शरीर छोड़कर नवीन शरीर धारण करते हैं और इस क्रिया को ‘नवकलेवर’ कहते हैं।

नवकलेवर केवल उस वर्ष मनाया जाता है जिस वर्ष दो आषाढ़ मास आते हैं तथा यह संयोग 11 अथवा 19 वर्षों में आता है। नवकलेवर में ही विशेष नीम के पेड़ का चुनाव किया जाता है, जिससे मूर्तियां बनती हैं।

रथयात्रा का वर्णन :-

रथयात्रा में तीनों के लिए तीन अलग-अलग रथ तैयार किये जाते हैं, रथयात्रा में भी देवी सुभद्रा का रथ बीच में और बलराम का रथ सबसे आगे तथा भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे पीछे होता है।

सबके रथों के नाम भी अलग अलग हैं-

  • भगवान् जगन्नाथ का रथ नंदिघोष के नाम से जाना जाता है और इसकी ऊचाई 45.6 फीट होती है,
  • बलराम जी का रथ तालध्वज नाम से विख्यात है जिसकी ऊंचाई 45 फीट और
  • देवी सुभद्रा 44.6 फीट ऊँचे दर्पदलन रथ में सवार होती हैं।

 

रथयात्रा की पौराणिक कथा :-

रथयात्रा देवी सुभद्रा का अपने मायके के प्रेम के कारण मनाया जाता है, कहते हैं जब भी वह अपने मायके आती थी तब रथ में बैठ कर पूर्ण राज्य की यात्रा करती थी और उनके साथ कृष्ण और बलराम भी होते थे। यह रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होती है और पुरी नगर से गुजरती हुई गुंडिचा मंदिर पहुँचती है। जहाँ प्रभु अपने भाई बहनों के साथ सात दिनों तक विश्राम करते हैं।

कहा जाता है कि गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर है।

मान्यता है रथयात्रा के तीसरे दिन देवी लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए यहां आती हैं, किन्तु दैतापति मंदिर के कपाट बंद कर देते हैं जिससे माता लक्ष्मी रुष्ट होकर रथ का पहिया तोड़ देतीं हैं और ‘हेरा गोहिरी साहीपुरी’ नामक स्थान पर जहाँ उनका मंदिर है, लौट जातीं हैं। फिर भगवान जगन्नाथ देवी लक्ष्मी को मनाने भी जाते हैं। यह रूठने मनाने की प्रक्रिया अभिनय द्वारा प्रस्तुत भी की जाती है, जो एक अलग ही दिव्य वातावरण का अनुभव कराती है।

 

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